Saturday, October 15, 2011

जिंदगी.1


जिंदगी ये क्या है,सहरा, एक छलावा है 
ख़ावाब गुमसुम है,पराया हर नज़ारा  है
अब देर रात चौराहे पे भी, अकेलापन तलाशना पड़ता है 
ख़ुशी में भी, तन्हाई औ  ग़म ढूँढना पड़ता है 
सड़कें अब खाली नहीं होती 
गलियाँ अब रूमानी नहीं होती 
आबो हवा अब बदली बदली सी लगती है
जो था कभी,वो आज है नहीं 
उम्मीद है, की कमबख्त जाती नहीं 
उम्मीदों का दामन थामे बैठा हूँ 
कौन जाने, अपनों या बेगानों संग बैठा हूं
वक़्त ये क्या है,तृष्णा,नागवारr इशारा  है
जिंदगी ये क्या है,सहरा, एक छलावा है 
ख़ावाब गुमसुम है,पराया हर नज़ारा  है....

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