किसको क्या बोलू, किस से करू गिला
जब वो मंज़र हमको मिल के भी ना मिला
बैठे थे तन्हाई में, कुछ बात ना हो सकी
परछाई भी यू अपने साथ ना हो सकी
वो साथ जो गुज़री थी,वो बात जो निकली थी
भीड़ में खो गयी, शोर में सो गयी
आवाज़ देके यू कितने पहर बुलाया तुमको
अपने हाथ से जो काजल लगाया तुमको
वो नुक्कड़ की दुकान से पान जो खाया था
तुम्हारे होंठों पे वो लाल रंग जो आया था
एक ख्वाब अंजाना सा जो दिल में समाया था
उस चोट ने हकीकत से यू वाकिफ़ कराया था
बस याद है जिंदा, बाकी कुछ न मिला
किसको क्या बोलू, किस से करू गिला
जब वो मंज़र हमको मिल के भी न मिला
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